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ऋग्वेद के कुछ सबसे महत्वपूर्ण मंत्र क्या हैं

मंत्र १.१.१: अग्निमीळे पुरोहितं यज्ञस्य देवं रत्वीजम्। होतारं रत्नधातमम्॥ अर्थ: हे अग्नि, आप पुरोहित (पथिक, पुरोहित या ब्राह्मण प्रधानतया यज्ञों का पुरोहित), यज्ञ का देवता, ऋत्विज (वेदीय यज्ञ में समर्थ और प्रकट ऋषि या ब्राह्मण ब्रह्मित व्यक्ति) और रत्नधातमम् (रत्नों का धारक) होतार हो। व्याख्या: इस मंत्र में प्रथम पंक्ति में अग्नि देवता का स्तुति किया गया है। अग्नि वेदों में प्रथमतः उपास्य देवता है और उसे विभिन्न यज्ञों में अधिष्ठातृदेवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है। पुरोहित शब्द से उसे यज्ञों के पुरोहित या पाठक के रूप में भी जाना जा सकता है। द्वितीय पंक्ति में यज्ञ की उत्तरोत्तर उद्दीपनार्थी ऋचा द्वारा आहुति के समय होतार की प्रशंसा की गई है। होता यज्ञ के अध्यक्ष और प्रधान पुरोहित होता है जो यज्ञ में आहुति ग्रहण करता है और वेद मंत्रों का उच्चारण करता है। रत्नधातमम् शब्द से उसे यज्ञ में दानी रत्नों का धारक भी समझा जा सकता है। वेदों के अनुसार यज्ञ के कर्मों के फलस्वरूप यजमान को रत्नों का धारक माना जाता है। मंत्र १.८.१०: अश्वपूर्वीरं रथमध्यमं हस्तिनादप्रभोद्वान्। आस्य वाजी नो भवतु वेति॥ अर्थ: हे भगवान, हमें अश्वपूर्वीर रथ (जिसके पहले घोड़े होते हैं), मध्यम (बीच का यात्री रथ), और हस्तिनादप्रभोद्वान (जिसके नाद से हाथी उत्थान होते हैं) करें। आस्य वाजी (यज्ञों के सहज रूप से शीघ्र पूर्ण होने की आकांक्षा) हमारे निकट हो जाए॥ व्याख्या: इस मंत्र में यज्ञ के उपकरणों की उत्तरोत्तर उद्दीपनार्थी ऋचा द्वारा सजावट का प्रस्तुतिकरण है। यज्ञ के साथ रथ, हाथी, और अश्व योजना किए जाते हैं ताकि वह विशेषतः पूर्ण हो सके। रथ, अश्व, और हाथी यज्ञ में भाग लेने के लिए प्रयुक्त उपकरण होते हैं, और इनके सही योजना के बिना यज्ञ की सिद्धि नहीं हो सकती। आस्य वाजी से उद्दीपित होने का अर्थ है कि यज्ञ शीघ्र उत्तरोत्तर पूर्ण होता जाए और यजमान को उसके साथ पूर्ण आनंद मिले। इस मंत्र में यज्ञ के प्रति आकांक्षा और श्रद्धा का वर्णन किया गया है। मंत्र १.८.४०: इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहुरथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहुः॥ अर्थ: बहुधा लोग उसे एक कहते हैं, विप्र (ज्ञानी), दिव्य (दिव्य शक्तियों वाले), सुपर्ण (सुंदर पक्षियों के समान चमकदार), गरुड़मुखी इन्द्र, मित्र, वरुण, और अग्नि को। विप्र लोग उसे एक कहते हैं, और अन्य बहुत से उसे अनेक रूपों में विविध शक्तियों वाले देवताओं को भी। व्याख्या: इस मंत्र में यज्ञ के संबंधी ब्रह्मा, विष्णु, और महेश द्वारा ब्रह्मा, विष्णु, और महेश द्वारा सम्बोधित किया गया है। इनके अलावा विप्र लोग उसे विभिन्न रूपों में विविध शक्तियों वाले देवताओं को भी सम्बोधित करते हैं। इसके अलावा इस मंत्र में यज्ञ के प्रति श्रद्धा और समर्पण का भी वर्णन किया गया है। मंत्र १.९०.११: या पृथिव्यां द्यामुदयच्छन्तमादित्यवर्णं तमसस्तु पारे। सर्वाणि रूपाणि विचित्य धीराः नामानि कृत्वाभिवदन्ति यस्ते॥ अर्थ: जो व्यक्ति पृथ्वी और आकाश में से ऊपर उठना चाहता है और जो अदिति वर्ण (जो बिना वर्ण है) है, उसे तमस के पार पहचानते हैं। धीर लोग उसके विभिन्न रूपों का विचार करके उसके विभिन्न नामों से यथार्थता से संबोधित करते हैं। व्याख्या: इस मंत्र में पृथ्वी और आकाश में से ऊपर उठने की आकांक्षा, वेदीय यज्ञ का प्रतीकता और पूजा करने की इच्छा का वर्णन है। यज्ञ का मुख्य उद्दीपनार्थी ऋचा द्वारा प्रस्तुतिकरण है। धीर लोग उसे विभिन्न रूपों म